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Swati Pandey

कैद नही होने स्वतंत्र से डरते हैं लोगपिंजड़े नही खुले गगन से डरते है लोगझेल ली है इतनी गुलामी , कि अब तो अंत नही अनंत से डरते है लोग ।वेदना नहीं संवेदना से डरते है लोगजड़ बुद्धि में बची हुई चेतना से डरते है लोगबढ़ने की चाहत गवां दी है ऐसे ,कि अब तो मिलती हुई प्रेरणा से डरते है लोग ।निराशा नही आशा से डरते है लोगमूक न
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