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डरते हैं लोग

कैद नही होने स्वतंत्र से डरते हैं लोग
पिंजड़े नही खुले गगन से डरते है लोग
झेल ली है इतनी गुलामी , कि अब तो अंत नही अनंत से डरते है लोग ।

वेदना नहीं संवेदना से डरते है लोग
जड़ बुद्धि में बची हुई चेतना से डरते है लोग
बढ़ने की चाहत गवां दी है ऐसे ,कि अब तो मिलती हुई प्रेरणा से डरते है लोग ।

निराशा नही आशा से डरते है लोग
मूक नही अनेक भाषा से डरते है लोग
झूठ रग में समा के ही बैठा है ऐसे, कि अब तो सच की अभिलाषा से डरते है लोग ।

घने कोहरे नहीं उगते सवेरे से डरते है लोग
वेग धारा नहीं लम्हें ठहरे से डरते है लोग
दोहरे जीवन की आदत भी ऐसी पड़ी ,कि अब तो खुद के ही छिपे जोशीले चेहरे से डरते है लोग ।

बाह्य सृष्टि नहीं अंतर्मन से डरते है लोग
स्थिरता नहीं परिवर्तन से डरते है लोग
सोच जग की है ऐसी विषैली हुई ,की अब तो मन के मंथन से डरते है लोग ।

जीते नहीं पल-पल मरते है लोग
पंख अपने खुद ही से कुतरते है लोग
जुल्म सह लेंगे अश्रु बहा के सभी
कुछ भी कहने से पर यहाँ डरते है लोग । 

-इति

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